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holi kyu khelte hain || holi kyo manaya jata hai

हैल्लो एंड वेलकम दोस्तों आप पड़ रहे  हमारे वेबसाइट  पर "holi kyu khelte hain"  और हमें आशा है की आप लोग भी ठीक होंगे और होली का इंतजार कर रहे है  तो आपको यह जानकारी अवश्य होना चाहिए की होली क्यों मनाया जाता है | क्योकि अगर आप होली खेल रहे है और आपको यह नहीं पता की #holi_ka_tyohar_kyo_manaya_jata_hai  तो क्या होगा |  मन लेते है | आपके घर कोई छोटा बच्चा ही आपसे पूछ ले की भैया holi kyu khelte hain तो आप क्या जवाब देंगे तो इसीलिए मैंने इस टॉपिक पर यह आर्टिकल लाया हु और आप यह जानना चाहते है तो आप बिलकुल सही जगह पर आये हुए है तो चलिए इस आर्टिकल को शुरू करते है

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होली का इतिहास 
हिरांडीकशयप प्राचीन भारत का एक  राजा था जो की राक्षस की तरह था | वह अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेना चाहता था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था | इसलिए अपने आप को शक्तिशाली बनाने के लिए उसने सालो तक प्राथना की | और उसे वरदान मिला | लेकिन इससे वह अपने को खुद भगवान समझने लगा और वह खुद ही भगवान की तरह लोगो से कहने लगा की आप  लोग हमारी पूजा करो | इसी दुष्ट राजा का एक बेटा था जिसका नाम प्रह्लाद था और वह भगवान विष्णु का परम भक्त था वह अपने माता पिता का कहना कभी नहीं मनाता वह सिर्फ भगवान विष्णु की पूजा करता रहा | इसलिए वह दुष्ट राजा अपने बेटे नाराज होकर वह अपने बेटे को मारने  का प्लान बनाया | उसने अपनी बहन होलिका को कहा की तुम प्रह्लाद को गोद  में लेकर आग बैठ जाओ क्यो की होलिका आग में नहीं जल सकती थी | लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हुई क्योकि प्रह्लाद अपना सारा समय भगवान विष्णु की पूजा में बीतता था | और वह बच भी गया और दुष्ट राजा की  बहन होलिका आग में जल कर रख हो गई |  इसके बाद भगवान विष्णु ने दुष्ट राजा को भी मार दिया |  होलिका  का ये हर बुराई के नष्ट होने का प्रतिक है इसीलिए भारत में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतिक के तौर पर होली को जलाई जाती है और दूसरे दिन रंग खेला  जाता है |

होली के दूसरे दिन रंग क्यों खेला जाता है 
यह कहानी भगवान विष्णु के अवतार कृष्णा के समय तक जाती है मन जाता है की भगवान कृष्ण रंगो से होली मानते थे | वे वृन्दावन और गोकुल में अपने साथियो के साथ होली मानते थे और वे अपने पुरे गांव में मजाक भरी सैतानिया करते थे | इसिलए होली का त्यौहार रहो के रूप में लोकप्रिय हुआ | लेकिन आज भी भारत के कुछ राज्यों में होली का त्यौहार बसंत के फसल पकने के सम्बन्ध में मानते है | वह के किसान अच्छी फसल के पैदा होने की ख़ुशी में होली का त्योहर मनाया जाता है | होली को बसंत महोत्सव या काम महोत्सव भी कहा जाता है | आज भी वृन्दावन जैसी होली कही नहीं खेली जाती है |
                                            
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होली का कार्यक्रम 
होली दो दिन का त्यौहार है लेकिन भारत के  कई राज्यों में यह तीन दिन तक मनाया जाता है ।

पहले दिन  – इस  दिन एक थाली में रंगों को सजाया जाता है और परिवार का सबसे बड़ा व्यक्ति परिवार के बाकि छोटे व्यक्तियों पर पर रंग छिड़कता है।

दूसरे दिन  –  इस दिन को  होलिका और प्रहलाद की याद में होली जलाई जाती है। अग्नि देवता के आशीर्वाद के लिए मांएं अपने बच्चों के साथ जलती हुई होली के पांच चक्कर लगाती हैं।

तीसरे दिन  –  यह दिन  होली उत्सव का अंतिम दिन होता है। इस दिन एक दूसरे पर रंग और पानी डाला जाता है। भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों पर भी रंग डालकर उनकी पूजा की जाती है।

होली का रंग कैसे बनता है 
पहले होली के रंग टेसू या पलाश के फूलों से बनते थे लेकिन  उन्हें गुलाल कहा जाता था। वो रंग त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होता था। लेकिन समय के साथ रंगों की परिभाषा बदलती गई। आज के समय में लोग रंग के नाम पर कठोर और खतरनाक  रसायन का प्रयोग करके बनाते है यह रंग शरीर पर बहुत ही खतरनाक असर डालता है | इन खराब रंगों के चलते ही कई लोगों ने होली खेलना छोड़ दिया है। हमें इस पुराने त्यौहार को इसके सच्चे स्वरुप में ही मनाना चाहिए। और ज्यादा से  ज्यादा प्रयास कर रह पहले जैसा उसे करे मतलब उस रंग में केमिकल न मिला हो जो आपके त्वचा पर असर डालता हो |

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